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Matrubhumi – 11 (Repeat)

Am writing today’s blog in Hindi as it is my national language. That would be my homage to my country. I hope my readers will accept my decision and give me a feedback. Will surely translate and write the translation at the end of my blog for people who do not understand Hindi. Please forgive my grammatical mistakes, if any.

जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा
जहाँ सत्य, अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा

ये धरती वो जहाँ ऋषि मुनि जपते प्रभु नाम की माला जहाँ हर बालक एक मोहन है और राधा हर एक बाला जहाँ सूरज सबसे पहले आ कर डाले अपना फेरा

वो भारत देश है मेरा

अलबेलों की इस धरती के त्योहार भी हैं अलबेले कहीं दीवाली की जगमग है कहीं हैं होली के मेले जहाँ राग रंग और हँसी खुशी का चारों ओर है घेरा

वो भारत देश है मेरा

जब आसमान से बातें करते मंदिर और शिवाले जहाँ किसी नगर में किसी द्वार पर कोई न ताला डाले प्रेम की बंसी जहाँ बजाता है ये शाम सवेरा

वो भारत देश है मेरा

— राजेंद्र किशन

आज अपनी इस अंतिम पोस्ट में, मैं सिर्फ भारत पर किए गये उपचारों को याद करना चाहूँगा तथा उन उपकार करनेवालों को नमस्कार करना चाहूँगा।

आज के दिन सब से पहले भगवान को कृतज्ञतापूर्वक नमस्कार करता हुं क्यों कि उन्होंने हमें आजादी दिलाई। आप कहेंगे ऐसा क्यों? भगवान ने कौनसी भूमिका निभाई स्वतंत्रता-संग्राम में? किसीको ऐसा भी लगेगा की आप भारतीय लोग हर बात में भगवान को क्यों बीच में ले आते हो? इसलिए इस बात की स्पष्टता पहले कर लें। हां, हम भगवान को हर बात में ले आते हैं क्यों कि उनके बगैर मेरा, आपका या हमारा अस्तित्व ही नहीं! हमारा क्या, इस सृष्टि का अस्तित्व नहीं! और मैं बौद्धिक तौर पर भी इस बात को कह सकता हुं की भगवान ने हमें स्वतंत्रता दिलाई। यद्यपि यह मेरी जो सोच है, वह पांडुरंग शास्त्रीजी आठवले ने बनाई। द्वितीय महायुद्ध में ब्रिटन और उसके साथी देश विजयी हुए। विन्स्टन चर्चिल, जो उस समय ब्रिटन के प्रधान मंत्री थे, उन्होंने अपने जवानों तथा नागरिकों का मनोबल खुब टिकाया एवं बढ़ाया भी। युद्ध के बाद ब्रिटन में तुरंत चुनाव हुए। स्वाभाविक है जिस व्यक्ति ने आपको युद्ध में जीताया है, वही चुनाव में जीत कर आना चाहिए। अपितु हुआ ऐसा की चर्चिल चुनाव हार गए। एटली की लेबर पार्टी सत्ता में आई। वह भारत तथा अन्य देश, जिन पर ब्रिटीश साम्राज्य था, उन्हें स्वतंत्रता देने के पक्षधर थे। जबकि चर्चिल का दृष्टिकोण भारत के बारे में सर्वविदित है। अब ऐसा क्यों हुआ? लोगों का दिमाग किसने घुमाया? तब मैं मानता हुं की भगवान ने घुमाया। कारण समय अब आ गया था जब भारत स्वतंत्र हो तथा दुनिया का मार्गदर्शन करे। (अब क्या वह कर पाया है? यह एक दुसरा प्रश्न है।) इसलिए प्रथम भगवान को कृतज्ञतापूर्वक नमस्कार।

दुसरा नमस्कार उन सभी लोगों को जिन्होंने इस देश की स्वतंत्रता / देश के लिए अपना सबकुछ, यहां तक की अपना जीवन भी, दांव पर लगा दिया। जिन लोगों ने यह नहीं सोचा की उनका खुदका और उनके परिवार का क्या होगा! वाचक मित्रों, आप जरा सोचिए। लड़ाई किसके साथ थी? एक ऐसे साम्राज्य के साथ जिसके क्षितीज पर सूर्य कभी अस्त नहीं होता था। सफलता मिलेगी या नहीं, कोई हमारे बलिदान को याद करेगा या नहीं, कोई प्रकार की अपेक्षा नहीं। बस, स्वतंत्रता के इस महायज्ञ में झोंक दिया अपने आप को। उपर कविता में कही बातों के लिए ही सिर्फ सोचा और उसी के लिए लडे। एक १६/१७ साल का लड़का, खुदिराम बोस, हंसते हंसते सूली पर चढ गया। एक ६५/७० साल के महामानव, लाला लाजपत राय ने हंसते हंसते अंग्रेजों की लाठी झेली और अपनी जान न्यौछावर कर दी। एक ३०/३५ साल का युवा, स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर, परिवार की परवाह किए बगैर आंदामानमें ५० साल की एक नहीं अपितु दो-दो सजा मुस्कराकर स्वीकार लेता है। आज भी भगतसिंह, राजगुरु तथा सुखदेव के बलिदान को याद कर सर ऊंचा उठता है। तात्या टोपे, मंगल पांडे, वसुदेव बलवंत फड़के, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, असफाकउल्लाह खान, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, बिपीनचंद्र पाल यह सारे नाम सुनकर सीना अभिमान से फुल जाता है। इस सारी लड़ाई में हमारी माताएं-बहनें कहीं पीछे नहीं थी। रानी लक्ष्मीबाई, कित्तुर रानी चेन्नम्मा, कल्पना दत्त, अरूणा आसफ अली और उन जैसी कई महिलाओं ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। कितने नाम याद करें और कितने लिखें, इसलिए यहीं रूक कर सभी को कृतज्ञतापूर्वक नमस्कार करता हूं।

तीसरा नमस्कार उस व्यक्तिमत्त्व को जिसने सारे भारत को एक करने हेतु सारे भारत का भ्रमण कीया। उन्हें लोग आधुनिक भारत का चाणक्य कहते हैं। ५०० से ज्यादा रजवाड़ों को समझाकर, प्यार से भारत में सम्मिलित कर लिया। जो समझाने पर नहीं माने, उनको उनकी ही भाषा में समझाकर सम्मिलित किया। यह व्यक्ति ओर कोई नहीं अपितु महात्मा गांधी की बातों पर अडिग तथा अविचल श्रद्धा रखनेवाले सरदार वल्लभभाई पटेल। उस समय की कांग्रेस का संगठन अगर मजबूती से खड़ा था, गांधीजी की कही हर बात को उठाने तैयार था, तो उसमें इस एक व्यक्ति का बड़ा कर्त्तृत्व रहा है। इस महामानव को हम भारत रत्न से नवाजे या नहीं, वह भारत मां के सच्चा रत्न है। आज हम उनको श्रद्धा सुमन अर्पित कर सके ऐसा कोई स्थान या समाधि नहीं है, यह बात मन को दुखी कर देती है। आज की पीढ़ी उस व्यक्ति के बलिदान को समझ भी पाएगी या नहीं यह सवाल मन को सताता है। क्या उनके परिवार को आज कोई पहचानता है, यह यक्ष प्रश्न है। उनके परिवार के साथ किया गया बर्ताव किसी भी सभ्य समाज को सोचने पर मजबूर करेगा कि क्या इसलिए आजादी के लिए वह सब लड़े होंगे? उनको अपेक्षा भले ही न रही हो, पर हम देशवासियों का उनके प्रति कुछ कर्तव्य है या नहीं?

पर आज भारत विश्वगुरु तो ठीक अपने गली (आशिया खंड) का भी गुरु कहलाने लायक है? तकनीकी विकास एवं आर्थिक सुदृढ़ीकरण से ही क्या हम यह कर पायेंगे? एक समय था जब विश्व भारत से आध्यात्मिक चेतना पाता था। स्वामी विवेकानंद तथा गुरू अरविंद उसकी चेतना थे। विनोबाजी तथा रविशंकर महाराज (गुजरात) जैसै समाज की भावनाओं को टिकाने और बढ़ाने वाले निस्वार्थ समाजसेवी थे। भारत की चेतना हमेशा से भावनिक एवं आध्यात्मिक रही है। आज हम कहां हैं? इसका मतलब कोई यह न समझे की मैं तकनीकी विकास के खिलाफ हुं। पर सिर्फ उसी एक अंग की तरफ ध्यान देकर भी नहीं चलेगा। भारत का तथा भारतीयोंका विकास सर्वांगीण होना होगा। तभी वह फिर से सोने की चिड़िया कहलायेगा। और इस दिशा में पूरे समाज ने काम करना होगा। व्यक्ति की सोच में परिवर्तन लाना होगा। शिक्षा में से भारत के लिए प्यार और संवेदना जगानी होगी। तभी जाकर उसका परिणाम थोड़े सालों बाद दिखेगा।

हमारे जीवन में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रिय अस्मिता यह दोनों को जगाने की अत्यावश्यकता है। सही इतिहास पढ़ाना होगा। वामपंथी तथा दक्षिणपंथी विचारधाराओं से ऊपर उठकर सोचना होगा, लिखना होगा तथा जीना होगा।
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥
(कुल के हितार्थ एक का त्याग करना, गाँव के हितार्थ कुल का, देश के हितार्थ गाँव का और आत्म कल्याण के लिए पृथ्वी का त्याग करना चाहिए ।) हमने सभी ने अपने कुल, गांव, राज्य से ऊपर उठकर सोचना होगा। अपने मान-सम्मान, जय-पराजय, बड़ा-छोटा इन बातों में से निकलकर हर एक व्यक्ति की बात सुननी होगी। किसके मुंह से कौनसी अच्छी बात कब भगवान बुलवा दे, क्या मालूम!

मां भारती के हित को सर्वोपरि मान सब ने साथ मिलकर निर्णय लेने होंगे।हमारी संविधान सभा ने, हम सब अपने मतभेदों के बावजूद, साथ काम कर सकते हैं, इसका उत्तम उदाहरण हमारे सामने रखा है। हर एक व्यक्ति को जब लगेगा की यह देश मेरा है और इसको सही ढंग से चलाना, संभालना, आगे ले जाना यह मेरी जिम्मेदारी है तभी भारत जनतंत्र होगा। जब हरेक व्यक्ति अपनी राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी समझेगा तभी हमें सच्चे अर्थ में स्वतंत्रता प्राप्त होगी।

इसे करने के लिए हमने भारत भ्रमण करना होगा। भारत के कोने-कोने में जाना होगा। लोगों से यत्किंचीत स्वार्थ के बगैर जुड़ना होगा। लोगों में सोयी भावनिकता तथा आध्यात्मिकता को प्यार से जगाना होगा। तभी राष्ट्रीय चेतना का उदय होगा। तभी भारत महान बनेगा।

हम यह सब न कर सकें तो कम से कम जो यह काम कर रहे हैं, उनके प्रयत्नों में उपयोगी बनें। वह भी न कर पायें तो कम से कम उन प्रयत्नों की सराहना करें। और कुछ नहीं तो उनके काम में रोड़े तो न डालें।

मेरे वाचकों से भी नम्र विनंती है की कुछ छोटी छोटी बातें हम भी अपने जीवन में लाने की कोशिश करें तो वह भी बड़ी देशसेवा होगी। जैसे

१ गाड़ी चलाते वक्त सिग्नल न तोड़ना तथा अपने मोबाइल पर बात न करना।

२ अपने आपको निरोगी रखना। स्वस्थ नागरिक राष्ट्र की संपत्ति है।

३ हर साल अपने घर में अथवा आसपास के परिसर में एक पौधा लगाना और उसकी अच्छी तरह से देखभाल करना।

४ अपने घर के आसपास का परिसर साफ व स्वच्छ रखना।

५ प्लास्टिक का उपयोग टालना।

ऐसी ओर कई बातें हो सकती है, जो वाचक खुद तय कर सकते हैं और अपने जीवन में लाने की कोशिश कर सकते हैं। आओ हम सब मिलकर इतना भी कर सकें तो राष्ट्रदेवता जरूर खुश होंगी और हमें अपना बहुमूल्य आशिर्वाद प्रदान करेंगी।

भारत माता की जय।

वन्दे मातरम।

English Translation

Today, in this last post of this series, i would like to remember those who have showered favours on India and express my gratefulness towards them

I first bow down to God as He is the one who got India, Her independence. You, my reader, may ask me, How come God gave India independence? What was His role in it? How come you Indians always get God involved in everything? On the onset let us clarify this point as such. Yes, God is always a part of my writings and our Indian thought cause we believe that we exist because of him. Not only us but the whole creation exists because of Him. And yes I can logically prove that India got independence according to His wishes. Also at this point I should clarify that this thought has been imbibed in me by Pandurang Shashtriji Athavale. The World War II ended on a victorious note for Great Britain and it’s allies. Winston Churchill, the then prime minister, had led his country to victory through one of the toughest wars. It was he who has given the world the sign of Victory as “V”. He had kept up the high morale of the British troops and citizens during the war. The elections were due that same year and after this victory Churchill coming back to power was a foregone conclusion. But the results were surprising. Labour party with Clement Atlee as its head came to power. Labour was of the view of granting independence to British colonies including India. Winston Churchill’s idea and arrogance about India and Indians is well known to us by now. Now how did this happen? How did the electorate change its mind? I feel that God must have changed their minds. God had his own expectations from India, that let Her be free and guide the world over. (Has She been successful in living upto His expectations? is another question). Thus I first bow down to God.

I secondly bow down to the people who left their careers, families and laid down their lives for the independence of our country. My young readers in today’s times, it is difficult for us to imagine the situation or the battle at that time. Whom were we fighting against? A nation on whom the sun never set. Yet these people (freedom fighters) just selflessly offered themselves to the country without expecting. anything in return. Neither success, nor an expectation from Indians to remember their sacrifice. They just jumped into the burning fire of the independence struggle. A 16/17 year kid, Khudiram Bose, went to the gallows with a smile on his face. One 65/70 year man, Lala Lajpat Rai accepted the brunt of the English batons and gave up his life. A youth of an age of 30/35, Swatantryaveer Vinayak Damodar Sawarkar, accepted a two 50 year sentence in jail with a question “Will British Raj rule India for that much time?”. Our heads are held high even today while taking the names of Bhagatsingh, Rajguru and Sukhdev for their supreme sacrifice. Tatya Tope, Mangalore Pandey, Vasudeo Balwant Phadke, Chandrasekhar Azad, Ramprasad Bismil, Ashfaqullah Khan, Lokmanya Bal Gangadhar Tilak, Bipinchandra Pal, these and many other names make us feel a sense of pride. Let us also not forget the women power of India. Their participation too was to the fullest. Rani Laxmibai, Kittur Rani Chenamma, Kalpana Dutt, Aruna Asaf Ali and many such brave women participated actively in this fight. We can go on and on with these names, but we will just pause here and now bow down to all the known and unknown freedom fighters.

Thirdly I bow down to the person who unified India, as it exists now, and for that he travelled to every nook and corner of India. He is called the Chanakya of Modern India. He integrated more than 500 big and small kingdoms into India with love and understanding and persuasion. Those which could not be pursuaded through understanding and love were then integrated in the way and language they understood well. The person is none other than, the most ardent follower of Mahatma Gandhi, Sardar Vallabhbhai Patel. If Congress was strong then, ready to listen to and follow the Gandhian way, it was because of Vallabhbhai Patel who went around meeting person to person, village to village, city to city to propogate the ideas and ideals of Congress then. It does not matter whether we honour this great man with Bharat Ratna (the highest civilian honour in India), but he is truly a gem produced by Mother India. It is with utmost sadness, I have to say that we do not have a place or samadhi where we can pay our respects to this great son of India. Will we be able to understand the sacrifices this man has made? is a question that I leave to my reader to ponder over. Does India know the living generations of his family? The behaviour / treatment with the family of this great martyr makes one think, that did we fight for this? He did not have any expectations, agreed. But the question is that do we have any responsibility towards people like Sardar?

But where does Bharat stand today in the world? Are we the torch bearers of humanity for the world? Will only technological development and strong economic policy make us one? There was a time when the world recognised Bharat for its spiritual doctrines and borrowed from them. Swami Vivekanand and Gurudev Aurobind were it’s guiding light. We had selfless social workers in Vinoba Bhave and Ravishankar Maharaj (Gujarat) who tirelessly worked towards the betterment of the society as a whole. Where are we today? Lest someone understand am against technological development, let me clarify that am not. But only technological development is not going us to lead unto overall development. Don’t we feel that we are taking care of just one part of the developmental process and ignoring others? We, Bharatiyas will have to think holistically. That will help us regain our prosperity and respect. We will have to change the way we think. Will have to imbibe love and emotions for our country through our education system. If we do this today, then we will be able to see it’s fruits a few years later, cause change is slow.

Today we need to inculcate one’s love for his country and the pride of being an Bharatiya amongst all of us. We will have to study our true history for this. We will have to come out of the dogmas of left wingers and right wingers and think; write in that manner and live what we write and demonstrate. . त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥ (For the good of many, we will have to leave out one. For the good of the village we will have to leave out many. For the good of our country we will have to leave our village. And for self development and realisation, leave this worldly pleasures) We all have to rise above the narrow mindedness of selfishness, victory and listen to each and every citizen of India. We do not know, who will be guided by the God’s to suggest or speak the truth!

We will have to take all our decisions keeping Bharat and Her greatness in mind. We have done this before. The best example is our constituent assembly consisting of people coming from different areas, thoughts and leanings. Yet, for India, they all discussed, argued, debated and made unanimous decisions. Every person should know that it is his responsibility, our responsibility to run this country in a proper manner. To take care of it and to carry it forward on the path of progress is my responsibility, our responsibility. The day realise this and able to do this, will be the day when we will be democratic and independent in its true sense.

And for this, we will have to reach out to every nook and corner of Bharat. Reach out selflessly to each and every Bharatiya and develop a relationship based on love for our country. Will have to rekindle the fire of Spirituality with love and affection. That will be the rise of true nationalism. From that day onwards, India will again be a true torch bearer of humanity.

My readers, if we are unable to do this, let us all be helpful to people who are into it. If not helpful, let us appreciate the people who are doing it. Atleast let us not be thorn in their paths.

Lastly a small request to all my readers. Let us all try and inculcate some small things in our lives and try to contribute in the development of Bharat. Following are a few suggestions:

1. Not to break a red signal or talk on mobile phone while driving.

2. Keep ourselves healthy. A healthy person is an asset to his country.

3. Plant a small plant every year in your house or in your surroundings and take care of it around the year.

4. Keep your surrounding clean.

5. Avoid using plastic.

These are just a few suggestions. You can add / make yours and try to follow them. Let us all pledge to contribute to Bharat in our own small ways, then our Bharatmata would be happy and would also bless us with Her most valuable blessings.

Bharat Mata ki Jay.

Vande Mataram.

Author:

Am a teacher by profession. A student of History and international politics. Believe that Bhakti (Devotion) and Humanism can only save Humanity. Revere all creation. My thoughts are influenced by His Holiness Pandurang Shashtriji Athavale

10 thoughts on “Matrubhumi – 11 (Repeat)

  1. I read the entire post Ameet Bhai. I’d like to congratulate you for writing in such a depth without losing the essence of the subject till the last line. Really amazing!
    Vivekanand once said about Indians that our character make us gentleman not clothes. But status of Indians is now estimated by their expensive clothes.
    Supporting Bollywood films/content/songs which show woman as object makes you open minded.
    We are also lacking respect which is the core of our culture, we want to look cool by cursing some of our freedom fighters (e.g, Gandhiji, Savarkar and many more) without knowing their sacrifices. How much percent of our youth actually reads about our culture and heritage? In fact, the younger population has abandoned Newspaper reading or any kind of reading altogether. We are in a technilogical era, but it’s frighting to see how even our educated youth get swayed by fake Whatsapp forward. They have become too lazy to investigate a news by themselves.
    All I see around is young boys playing pubg all day long and making videos on TikTok. It’s a sad affair actually, and I even blame bad parenting and rigged educational system for this.
    In my view there’s no need to impose a culture on someone, but at least we should encourage the youth to read stuff, know our values and then decide to follow it or not. If they are well read, I’m sure they’ll develop a critical thinking – both logical and spiritual!

    You’re doing a great work, and I wish more people read this. Will share with my contacts.

    Liked by 3 people

  2. बहुत खूब अमीत जी। इतने दिनों बाद हिन्दी में कोई पोस्ट पढ़ी। आप हिन्दी में भी लिखा करें। मात्रभूमि — सारी पोस्ट 👌

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    1. It is very difficult for me to think in Hindi and write… it took me 3 – 4 hours of this, when I wrote it… I think in English, translate it and then type… takes time… and am a lazy person

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  3. मन गदगद हो गया पढ़कर। कैसे कहते हैं आप की इंग्लिश मीडियम से हूँ हिंदी कमजोर है।
    अगर कमजोर हिंदी ऐसी होती है फिर हमारी भी हिंदी ऐसी होती तो ज्यादा खुश होते।
    कितनी झुबसुर्ती से आपने एक एक विन्दुओ पर प्रकाश डाला है और सत्य कहा—हम विश्वगुरु बनना तो दूर गली के गुरु बनने की स्थिति में भी नही हैं।
    भला आजादी से अबतक जब पूजनीय वीर सावरकर जिन्हें दोहरी उम्र कैद संग अंग्रेजो द्वारा काले पानी की सजा मिली थी और दो अन्य भाईयों को उम्र कैद भला वे गद्दार कैसे हो गए और जब हम उनके साथ आज तक न्याय नही कर पाए फिर शेष की बात बेमानी है।

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